Friday, 6 July 2012

हाइकू

हाइकू

करिया मेघ
धऽ कोण पुवरिया
डेरा रहल ।

बिज्लोका लोकै 
ठनका ठनकल 
साहौर गाछ ।

हुनका लेल
की चिंता जिनकर 
कोठाक घर ।

जकरा छैक 
सड़ल एकचारी 
धुक-धुक्की छै । 

नंगटे नाचै
सभ नेना भुटका 
अलगे मस्ती ।

*पंकज चौधरी (नवलश्री) *
< ०६.०७.२०१२ >

हाइकू

हाइकू


तप्पत माटि
तड़पि रहल छै 
बरखा लेल । 

बुन्नी झहरै
सगरो पसरल
माटिक गंध ।

गरदा-बुन्नी
दुनु संग सानल
माटिक लड्डू ।

देखू देखिते
पोखरि बनि गेल
खेत-पथार ।

डोका- कांकौड़
लऽ लऽ छपकुनिया
बीछय सभ ।

धानक बीया
उजरल बिड़ार
खेत रोपेतै ।

खूब उपजा
भरि जैत बखारी
रीन-उरीन ।

ककरो लेखे
देवक वरदान
हेतैक मुदा !

ककरो घर
गर-गर चूबय
सड़ल चार ! 



*पंकज चौधरी (नवलश्री) *
< ०६.०७.२०१२ >

Thursday, 5 July 2012

विहनी कथा

विहनी कथा - "ई नोर छै गरीबी के" 

दक्षिण-पूब भर सँ अटूट मेघ घेरैत देखि बुधनी पूवैर बाधक एकपेरिया बाट पर नमहर-नमहर डेग झटकारने घर दिश विदा भेल. माथ पर घासक छिट्टा, कांख तऽर थोड़ सुखैल राहटक जारैन आ खोइंछ में नुका धेने छल सात-आठ टा रस्फट्टू आम जे अबैत काल बाट में बिछने छल अल्हुआ वला खेत लगका कलकतिया आमक गाछ तर सँ.. गाम परहक चिंता जान खेने जा रहल छलै. सात वरखक बेटा बंटी के घरे पर छोड़ि आयल छल. ओना ओ तऽ छाल छोड़ेने छल बाध अबै लेल मुदा रौद तेहन ने चंडाल उगल छलैक जे बुधनी के मोन नहि मानलकै आ ओकरा सुगिया काकी अंगना छोडि आयल छल. बुधनी के सभ सँ बेशी चिंता अहि गप्पक छलै जे जों ओकरा घर पर पहुंचै सँ पहिने वरखा शुरू भ गेलै तऽ जुलुम भऽ जेतै. चिपरी सभ बाहरे में सुखाइत छलै आ अंगना में खुद्दी सेहो पसारल छलै...आ हाँ चार पर बिरियो तऽ देने छलै बना कऽ सुखाई लेल, सभटा चौपट भऽ जेतै.. विचारक अहि उथल-पुथल में अगुताइल भागल जैत छल घर दिश. 

घर पहुँचते देरी छिट्टा अंगना में पटकि पहिने बंटी के शोर पारलक. ता धरि तऽ एकदम गुप्प अन्हार भऽ गेल छलैक आ जोड़-जोड़ सँ बिजलोका लोकय लागल छलै. संगहिं मेघ सेहो ढन-ढन गरज लागल छलै. बुधनी हडबडा कऽ सभटा काज करय लागल. आ बंटी... ओहो पाछू कियैक रहत..! ओहो छोटकी पथिया में चिपरी समेट कऽ उठाब लागल. कने कालक बाद खूब जोड़ सँ वरखा शुरू भऽ गेलै. बुधनी बंटी के लऽ कऽ दौड़ कऽ घर दिश भागल...मुदा ताहि सँ की..? घर की कोनो अंगना सँ नीक छलै..! सड़ल खऽर... मोनो नहि जेऽ कैऽ वरख भऽ गेल छलै छड़वेला. कोरो-बाती सेहो सड़ल-गलल. ओहिना टुक-टुक मेघ देखाइत...! राति कऽ बंटी घरे में बैसले-बैसल चंदा मामा सँ बतिया लैत छल आ तरेगन सँ खूब लुका-छिपी खेलैत छल. सौंसे घर में गर-गर पाइन चुबैत. कनिए काल में घर पाइन सँ भरि कऽ डबरा भऽ गेल. बुधनी छिपिया लऽ पाइन उपछ लागल. ओ पाइन उपछैत-उपछैत अप्सियांत भेल छल. आ बंटी.... ओकरा लेखे केहनो सन नहि....आ रहबे कियैक करतैक...? ओ तऽ कागतक नाह बना घर में अई कोन सँ ओई कोन धरि बहा कऽ आनंद सँ विभोर भऽ रहल छल. 

कने कालक पश्चात जहन खेलाइत-खेलाइत बंटी थाकि गेल तऽ नाह के ओहिना पाइने में हेलैत छोडि बुधनी के कोरा में जा बैसल आ बाजल माय गे भूख लागल अछि, किछु खाई लेल दे ने...! बुधनी एक दू बेर तऽ अन्ठेलक मुदा जहन बंटी छाल छोड़बय लागल तऽ बुधनी चिनवार पर बासन सभ के उनटा-पुन्टा कऽ देख लागल. किछु नहि भेटलैक...किछु रहतैक तहन ने भेटतै. मुदा बंटी कियैक मानत..आ फेर जे माइन गेल से नन्ने की..? बुधनी अकबकैल ओकर मूंह तकैत छल तखने कोठिक गोड़ा पर राखल मरुआ रोटिक एकटा टुकड़ी पर ओकर नजरि गेलै. बुधनी मोन पारय लागल जे कहिया के छियैक.... हाँ मोन पड़ल परसुए भोर में तऽ बनने छलियैक.. बुधनी ओ मरुआ रोटी पर थोड नून आ सुखायल अचार धऽ बंटी के दऽ देलकै. बंटी मगन भऽ खाय लागल. नेनाक चंचल मोन तऽ देखू…खाइत-खाइत बंटी बाजल माय गेऽ दू टुकड़ी पियाउज दे ने..! बुधनी सौंसे घर ढुरलक तऽ आधा टा पियाउज भेटलै.. ओ पियाउज सोहि बंटी के देबय लागल....! 

बुधनिक आंखि में नोर भरि गेलै. बंटी माय के मुंह दिश तकलक तऽ बाजल…की भेलऊ माय कियैक कने छिही. नहि तऽ कहाँ कनैत छी हम. नहि-नहि फेर नोर कियैक बहि रहल छौ. मोन खराब छौ की.. माथ दुखाई छौ, हम जाइंत दियौ...? नहि बउआ किछु नहि भेलै हमरा. हमरा कियैक माथ दुखैत…? ई सुनि बंटी चहकि कऽ बाजल... ओहो आब बुझलियौ तों पियाउज कटलहिन्ह हैं तैं तोरा आंखि सँ नोर बहैत छौ - छैऽ नेऽ..? बुधनी मोने-मोन सोचे लागल जे बउया तोड़ा कोना कहियौ जेऽ ई नोर माथ दुखेबाक कारणे आ की पियाउज कटबाक कारणे नहि बहि रहल अछि.... इ नोर...इ नोर तऽ गरीबी केर छैक. मुदा बुधनी सभटा दर्द अपना मोन में समेटने विरोगे लोल कोंचियाबैत आ जबरदस्तिये कनी मुस्कियैत बाजल "हाँ बउया पियाउज कटलियै तहि दुआरे नोर बहय लागल...! बंटी मायक ई गप्प सुनि ठिठिया कऽ हंसल आ मरुआ-रोटी-नून-अचार पियाउजक टुकड़ी संगे खाय में मगन भऽ गेल. गाल पर नोरक सुखायल धार नेने बुधनी के ओकर नेनपनक सत्य आ सुन्दर छवि देखि अजीब सन संतोषक अनूभूति भऽ रहल छलय..!!!

***इति श्री*** 

< पंकज चौधरी (नवलश्री) >
< ०५.०७.२०१२ >

Thursday, 28 June 2012

गजल

गजल-२५

मोहक मद में मातल जेऽ मोनक मीत बनै छी
ठेस कोना नञि लागत आन्हर भऽ प्रीत करै छी

श्रृंगारक पाछा आन्हर नै केलौं प्रेमक मोजर 
श्यामल तन अनुरागे आ विरहे पीत पड़ै छी 

पापी पेट पोसै लै परदेस देलौं पेटकुनिया
भरि जग सँ बौएलौं आब घरक भीत धरै छी

हाइरक डर डेरा कऽ छोड़ि देलौं सच बाजब
फूइसक गाछ छड़पि कऽ दुनिया जीत कनै छी

काँट - कूश सभ नंघलौं आऽब बाट जुनि पलटू
अहाँ संउसे खीरा खा कऽ कियै पेनी तीत करै छी

अनका सोझ उगललौं जेठक रौदी सन बोली
धधकल अपन करेजा पूसक - शीत तपै छी

अनकर मोन कलपतै कल्पऽ दियौ की करबै
अपना नीकक चिंता मनमरजी रीत रचै छी

कर्मक ई बान्ह-बन्हौटा कियै बान्है छियै अनेरे
बस चारि डेग चललौं आ से बीते-बीत नपै छी

"नवल" रमल अपना में कविता - पाठ करै छी
गजल कहै छी कखनो आ कखनो गीत गबै छी

--- वर्ण- १८ ---
(सरल वार्णिक बहर)
►नवलश्री "पंकज"◄
< २८.०६.२०१२ >

बाल गजल

बाल गजल-५

कीन दे मुरही-कचरी-झिल्ली लवनचूस आ बिसकुट माँ 
लोढि बाधसँ धान जे अनलौ तकर कीन दे तिलकुट माँ

धान अगोअं के जे उसरगल तकर कीन दे फीता-बाला
काकी जे देलखिन बाला से हाथमें होई छइ छुट-छुट माँ

ललका फीता गूहल जुट्टी तेल सँ माथा गमकै गम-गम
थकरै केश जहन ककबा लऽ ढील केऽ मारै पुट - पुट माँ

देखि भूख सँ लोहछल नेन्ना दुःख-सुख सभटा लोप भेलै
भंसा घर में घाम सँ भीजल काज करै सभ चुट-चुट माँ

होय कहाँ अनका देखबैलै "नवल" इ मायक माया-तृष्णा
भेड़ निन्न तइयो कहि खिस्से दूध पियाबय घुट-घुट माँ

--- वर्ण- २२ ---
(सरल वार्णिक बहर)
►नवलश्री "पंकज"◄
< २४.०६.२०१२ >

Tuesday, 26 June 2012

गजल

गजल-२४

कने काल लै जे काज लसियैल जाय छै 
ओ अहिना दिने -दिन बसियैल जाय छै 

जकरा बूइध में छलैयै वियैधि धेने 
आब बुइधिए सँ ओहो खियैल जाय छै 

पहिने दूधो - दही के नञि नपना छलै 
आब नापिए क पाइनो पियैल जाय छै 

जों धिया के वियाह मांग अनुचित भेलै
बेटा बेचै लय बोगली सियैल जाय छै

जाबे तौला भरल ताऽ तऽ सुरसुर केलौं
आब जोड़ण लै टोल छिछियैल जाय छै

मूंह देखिये कऽ मुंग्बा बाँटय के चलन
एत भेटै नै किछु सभ दियैल जाय छै

छलै करनी ई कारण आ की कुसमय
किछु निरोगो जे छल बझियैल जाय छै

कतौ आंचे ओतेऽ नञि की इनहोर हेतै
कतौ धधरा ततेऽ जे उधियैल जाय छै

कामना में "नवल" होश सभके मतल
कियै जोशक लहरि भसियैल जाय छै

--- वर्ण- १५ ---
(सरल वर्णिक बहर)
►नवलश्री "पंकज"◄
< २७.०६.२०१२ >

Monday, 25 June 2012

गजल


गजल-१७
 
काजर सन कजरौटो कारी भाग जगैयै काजर के  
पाकि रहल कजरौटा त की सुख भेटैयै काजर के
 
लोक करइयै मोहित भ घाट-बाट काजर के चर्चा 
कजरौटा के हाल के पूछत सभ देखैयै काजर के  
 
अवहेलित  कजरौटा  खाली  काजर नयन नचैयै
कोन धेने  कजरौटा बैसल  देखि जड़ैयै काजर के
 
कजरौटा के भाग सिया सन सुख सपनेहु नै भेल
टेमी सँ पुछियऊ ओ सभटा भेद बुझैयै काजर के
     
"नवल" हाथ लेती कजरौटा फेर लगेती काजर ओ 
अहि मोह में फंसि कजरौटा फेर पोसैयै काजर के 
 
 --- वर्ण- २० ---
(सरल वर्णिक बहर)
►नवलश्री "पंकज"◄
 < २६.०६.२०१२ >

गजल


गजल-१६
 
ओहिना आंइख की कम कारी जे काजर के विनयास केलौं
मेघ  करिकबा  भादव  केऽ  तकरो  रंगक परिहास केलौं 
 
अरिकंचन सन  काया  तैऽ पर  ई सोलह श्रृंगार गजब
पिया मिलन के राति अहाँ श्रृंगार अलग किछु खास केलौं  
 
नेह  छोड़ि  नमरी लऽ नचलहुं जीवन गेल  निरसता में
देश - विदेश कतेऽ छिछियेलौं अनढन केऽ वनवास केलौं  
 
मानल छी दोखी हम सजनी मुदा आब सप्पत ल लीयऽ
गोल - गोल कारी नयना कियै काजर पोईछ उदास केलौं  
 
अनुराग शेष नहि टाका केऽ कोठा नेऽ आब बखारिक मोह
अहीं करेजा प्रीतक धन लऽ "नवल" आब घरवास केलौं 
 
 --- वर्ण- २२ ---
(सरल वर्णिक बहर)
►नवलश्री "पंकज"◄
 < २५.०६.२०१२ >

गजल


गजल-१४
 
बौआ के छटिहारक राइत मिथिला-विधिए नियारल काजर 
शुभग - सिनेहक ठोप करिकबा मौसी हाथक पारल काजर
 
नवरातिक अहि शुभ-बेला में अबै अष्टमिक राति डेराओन
माय अपन संतति सभके तें आंखि दुनु चोपकारल काजर
 
अन्हरिया राति अमावस के ई दीप - पुंज मुंह दूइश रहल    
राइत दिवालिक लेसल टेमी तंत्र - मन्त्र  उपचारल काजर 
 
कते सुहन्गर स्वप्न सजोने कजरायल आँखिक पेपनी पर
बरसाति -पंचमी- मधुश्रावनि नवकनिया के धारल काजर 
 
नव यौवन के नव तरंग इ  "नवल" मोन भसियेबे करतै 
गोर-गोर चन्ना सन मुंह पर सजनी कियै लेभारल काजर
 
 --- वर्ण- २४ ---
(सरल वर्णिक बहर)
►नवलश्री "पंकज"◄
< २५.०६.२०१२ >

Saturday, 23 June 2012

गजल

गजल-९

सभ मात-पिता केर शौख-सेहन्ता बौआ करता नाम
मगन जुआनिक माया नगरी बौआ मनसुख राम

छथि बाबू-पित्ती घरक धरणि थम्हने बनि क खाम
संतति कर्म सँ देह नुकौने करम केने अछि बाम

बाबुक अरजल पर में फूटानी माटि लगै नै चाम
जों अपना कन्हा हर पड़ल त जय-जय सीता-राम

अन्तह शोणित सुखा रहल आ घर बहय नै घाम
बबुआनी केर अजब छै सनकी बैरी भ गेल गाम

ईरखे नान्गैर कटबै लै जे तेजलक मिथिला धाम
परदेसक माया ओझरायल घूमि रहल छै झाम

अपना आँगन सोन छोईड़ क अनकर बीछी ताम
घर छोड़ि घुर-मुड़िया खेलक कहिया लागत थाम

मोल बुझय नहि भावक भाषा भाव पूछय नै दाम
चलु रहब माँ मैथिल आँगन नेह बहय जै ठाम

"नवल" निवेदन मैथिल जन सँ छोडू नै मिथिलाम
छै पागक शोभा माथे पर आ चरणहि नीक खराम

----- वर्ण - २० -----
►नवलश्री "पंकज"◄

बाल गजल

बाल गजल-१
निश्छल-निर्मल कोमल बचपन
धिया-पुता केर अलगहिं जीवन
चलैत रहछि  सभके अंतर्मन
भावक अजबहिं कूटन - पीसन
छै देह लेढायल मोन ई कंचन
कमल-फूल सन लागै अनमन 
क्षण ठिठियै क्षण कानै अनढन
चट सलाह आ झट द अनबन
बस टांट सोहारी बसिया तीमन
उठि भोरहरबा  सभ सँ नीमन
इस्कूल सँ बचबा लेल धरछन
नीक लगई छई मरुआ मीरन
कितकित पाड़ल सगरो आँगन
चईत-कबड्डी मुँह में सदिखन
हो मेघ-सुरुज या चान-तरेगन
जहि पर हाथ धेलक से अप्पन
"नवल"कथी फुरि जेतय कक्खन
बाल-मनक नै किछु परिसीमन
  --- वर्ण- १३ ---
(सरल वर्णिक बहर)
►नवलश्री "पंकज"◄
< ०४.०४.२०१२ >