Monday, 25 June 2012

गजल


गजल-१६
 
ओहिना आंइख की कम कारी जे काजर के विनयास केलौं
मेघ  करिकबा  भादव  केऽ  तकरो  रंगक परिहास केलौं 
 
अरिकंचन सन  काया  तैऽ पर  ई सोलह श्रृंगार गजब
पिया मिलन के राति अहाँ श्रृंगार अलग किछु खास केलौं  
 
नेह  छोड़ि  नमरी लऽ नचलहुं जीवन गेल  निरसता में
देश - विदेश कतेऽ छिछियेलौं अनढन केऽ वनवास केलौं  
 
मानल छी दोखी हम सजनी मुदा आब सप्पत ल लीयऽ
गोल - गोल कारी नयना कियै काजर पोईछ उदास केलौं  
 
अनुराग शेष नहि टाका केऽ कोठा नेऽ आब बखारिक मोह
अहीं करेजा प्रीतक धन लऽ "नवल" आब घरवास केलौं 
 
 --- वर्ण- २२ ---
(सरल वर्णिक बहर)
►नवलश्री "पंकज"◄
 < २५.०६.२०१२ >

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