| गजल-१६ |
| ओहिना आंइख की कम कारी जे काजर के विनयास केलौं |
| मेघ करिकबा भादव केऽ तकरो रंगक परिहास केलौं |
| अरिकंचन सन काया तैऽ पर ई सोलह श्रृंगार गजब |
| पिया मिलन के राति अहाँ श्रृंगार अलग किछु खास केलौं |
| नेह छोड़ि नमरी लऽ नचलहुं जीवन गेल निरसता में |
| देश - विदेश कतेऽ छिछियेलौं अनढन केऽ वनवास केलौं |
| मानल छी दोखी हम सजनी मुदा आब सप्पत ल लीयऽ |
| गोल - गोल कारी नयना कियै काजर पोईछ उदास केलौं |
| अनुराग शेष नहि टाका केऽ कोठा नेऽ आब बखारिक मोह |
| अहीं करेजा प्रीतक धन लऽ "नवल" आब घरवास केलौं |
| --- वर्ण- २२ --- |
| (सरल वर्णिक बहर) |
| ►नवलश्री "पंकज"◄ |
| < २५.०६.२०१२ > |
Monday, 25 June 2012
गजल
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